क्या तुम सुखी हो

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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मेरे सीने में था गुलाब-बाग़ीचा

एक दिन ख़ून से लथपथ एक गुलाब ने

सूखे काँटे से चुपके से पूछा—

क्या तुम सुखी हो

सुखी हो तुम?

गुलाब-पौधे से कुछ दूर अँधेरे में

मैं कान लगा रहने लगा

जाड़ा-गर्मी में झड़ती हैं फूल की पंखुरियाँ।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

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