मेरे सीने में था गुलाब-बाग़ीचा
एक दिन ख़ून से लथपथ एक गुलाब ने
सूखे काँटे से चुपके से पूछा—
क्या तुम सुखी हो
सुखी हो तुम?
गुलाब-पौधे से कुछ दूर अँधेरे में
मैं कान लगा रहने लगा
जाड़ा-गर्मी में झड़ती हैं फूल की पंखुरियाँ।
मेरे सीने में था गुलाब-बाग़ीचा
एक दिन ख़ून से लथपथ एक गुलाब ने
सूखे काँटे से चुपके से पूछा—
क्या तुम सुखी हो
सुखी हो तुम?
गुलाब-पौधे से कुछ दूर अँधेरे में
मैं कान लगा रहने लगा
जाड़ा-गर्मी में झड़ती हैं फूल की पंखुरियाँ।

जोत-कोड़ डालो इस परती आदमी-ज़मीन कोलोहे के तेज़ फाल से तोड़-तोड़ डालो
कहीं भी गद्य का उजाला नहीं हैबहुत फ़ीकी पड़ गई मेरी कविता
कठोरता से ठोकर खाकर लौट आती है कवि की आवाज़,प्रतिद्वंद्वीविहीन
मेरी क़लम लोहार के हाथ का हथौड़ा, ठोंक-पीट कर बनाता हूँ शब्दकिसान के फाल जैसा पैना; हलरेखा में सोने की सीता,
(मैं अब भी गीत सुन कर रुक जाता हूँ)कविता शुरू करना कठिन है