प्यास का मज़हब

आदित्य रहबरआदित्य रहबर

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भूख

भूख होती है

प्यास

प्यास।

अक्सर मैंने ऐसा सोचा

किंतु दुनिया मेरे मन से कहाँ चलती है?

पानी कभी गंगा

तो कभी आब-ए-ज़म-ज़म हो जाता है

भूख

कभी पेट की

मज़हब की

कट्टरता की

तो कभी वासना की हो जाती है

किसने बनाई यह रीत

ये क़ायदे-कानून?

प्यास सरहद और मज़हब

देखकर तो नहीं लगती

आब-ए-ज़मज़म हो या गंगा

आख़िर पानी ही तो है

प्यास ही तो बुझाती है

नफ़रत की रेत

ऐसे ही उड़ती रही

तो न यहाँ पानी बचेगा

न मज़हब

न हम

सिवाय बंजर पड़ी भूमि के

जहाँ वसंत नहीं आएगा

फूल नहीं खिलेंगे

अगर कुछ होंगे

तो सिर्फ़ काँटे

और काँटे कभी प्यास नहीं बुझाते

वे तो सिर्फ़ चुभना जानते हैं।

आदित्य रहबर
About the poet

आदित्य रहबर

नई पीढ़ी के कवि-लेखक।

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