मैंने चाँद को दिखाते हुए पानी पिया

हेमंत कुकरेतीहेमंत कुकरेती13 Mar 1965

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चाँद पूरा था

उमस पृथ्वी की देह से होकर पहुँच रही थी उस तक

वह काले बादलों के बीच से सभ्यता की तरह गुज़र रहा था

या कहें कि

काले बादल काल की तरह उसे पछाड़ते हुए गुज़र रहे थे

मुझे प्यास लगी

ख़ूब गहरी

प्यास का माप नहीं था कोई आकार नहीं

जिस बर्तन में प नी था मैंने उसे प्रेम से देखा

और चाँद को दिखाते हुए ख़ूब पानी पिया

चाँद को कितनी राहत मिली पृथ्वी की देह से होकर

उमस पहुँच रही थी उस तक

हेमंत कुकरेती
About the poet

हेमंत कुकरेती

सुपरिचित कवि। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : हेमंत कुकरेती जन्म : 13/03/1965 | गढ़वाल, उत्तराखंड

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