तुम्हें अपने में कर लूँ सम्पृक्त
क्या इसीलिए मिली ये भुजाएँ?
तुम्हें सम्पूर्णता में शोषित कर लूँ
क्या इसीलिए मिले हैं ये अधर?
प्रतिक्षण तेरा ही ध्यान करूँ
क्या इसीलिए मिला है यह मन?
तुम यह सब कुछ समझती हो;
शायद इसीलिए
इन्हें नकारती हो।
लगता है
कि तू पूरी तरह घुल-मिल गई मुझमें
फिर भी कुछ दूरी रह जाती है,
तुझे सोख लेता हूँ यथाशक्ति
फिर भी अंतर में तृष्णा बच रहती है।
तुम मुझमें सम्पृक्त होकर भी
मुझसे पृथक् क्यों हो?
इसी अधूरेपन से ही
खिलती है
मेरे दर्द की कली।
रीते घट में
क्यों है यह पागलपन
कि मैं समुद्र सोखूँगा?
मन में
क्यों पलती है यह लालसा
कि मैं धरती को उर में रख लूँगा?
मन को मिला था
जो एक ओस-कण,
क्या वह
अपर्याप्त था?
तुमने जो दिया था
सुवर्ण का एक कण
मैं तो वही रखूँगा
सहेज कर;
तुम्हें जो-जो कुछ चाहिए हो
ले लो।
तुम्हारे लेने पर
नहीं है बंधन कोई,
तुमने
जो भी दिया है
मुझको वही होगा पर्याप्त
ऐसा अक्षय दान है तुम्हारा।








