शेष गंध की तलाश में
घूमती रहती है धरती
या इसी चक्र में घूमते हैं
इस पर रहने वाले लोग
मृगतृष्णा है यह गंध
या इनसानों में भी है कोई कस्तूरी
विचित्र अग्नि है
रूह झुलसती नहीं
बस, सुलगती रहती है
भूख करवट यूँ बदलती है
मानो जलती लकड़ी
आँच ठीक करने के लिए
सरकाई जा रही हो
उसी आँच पर रोटी पकेगी
सोचकर नींद नहीं आती
आँच आती है, बढ़ती है
बस कमबख़्त रोटी नहीं आती
आँखें बुझ जाती हैं
नींद डबडबाती है
देह सो जाती है
पर भूख अपलक जागती है
एक लंबी रूदाली है
जिसकी सिसकियाँ नहीं थमतीं
एकसुरा ताल है जिस पर
ताउम्र नाचता है जीवन
एक ठूँठ पेड़ है
तने का हरापन ज़िंदा है
लहू, जो हरे में बह रहा है
वह अजर-अमर भूख है
देह के बाहर
देश की भूख अलग होती है
और देश के अंदर
सियासत की अलग भूख
अनंत सीमाओं की भूख लिए
दूर अंतरिक्ष से दिखते हैं देश
ऊन के उलझे धागों जैसे
कोई एक भी सीधी रेखा नहीं दिखती
दरअस्ल, भूख इन दिनों ऑक्टोपसी हो गई है।








