स्थिति

यादव खरेलयादव खरेल

1 min read · 12.4K reads

यह शून्य जैसी आकुलतामय अकर्मण्यता

यह घृणायुक्त अनास्था 'कुछ न होने' जैसी

यह अँधेरे जैसी भयव्याप्त निराशा

आज चुनौती देती है मानवीय अस्तित्व को

पनपती है जर्जरता,

पनपता है सूखा, अकाल, लँगड़ा-लूलापन, पक्षाघात

जीवन से वितृष्णा जैसे पाप—

छिपकर देखना चाहता हूँ आज मृत्यु को—

—जीवन के अंदर से।

ये माताएँ

चीते और भेड़िये, जन्मा रही हैं

कुत्ते और लोमड़ी,

बिल्ली और सियार।

सुनो मर्म के अंदर से उठते चीत्कार

त्रस्त हाहाकार।

देखो रो रहा है क्राइस्ट आज

कील से मर्माहत होकर, उस कील से

जो भाई द्वारा ठोंकी गई है भाई की छाती में।

घात-प्रतिघात की चोट से मर्माहत

ईर्ष्या-घृणा की ये आग

बुझाना चाहती है रक्त से आदमी

काल-रात्रि जैसी नाचना चाहती है मात देकर।

थकित गांधी रो रहा है आज

हिंसा के रक्त से रंजित

भाइयों के हाथ पकड़कर।

यादव खरेल
About the poet

यादव खरेल

नेपाल के प्रसिद्ध फ़िल्मकार और कवि-लेखक।

View profile & all 1 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like