कविता

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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शोक का संगीत वह, विषाद का है सुर

आर्त्त की है आह, है आँखों के आँसू

विषण्णता की है काली रेखा, तृष्णा है तृषित की

है वक्षविदारी यातना, कातर विधवा की।

धूप-छाँव-सुख की वह है क्षणिक हास,

सुरभि-वितरित करने वाली है गुलाब की पंखुड़ी

बिजली की चकाचौंध का है वह क्षणिक प्रकाश

चाँद की है कोमल कांति, पानी की है वह लहर

वीणा की है आत्मा वह, उड़-उड़ ‘गुण’ गाया करती

बाँसुरी का जीवन वह, जो डाली-डाली पर तान छेड़ती

रमणी की वह है कमनीय मधुर माधुरी

है अधखिली तोतली बोली स्वर्ग-शिशु की

लाज से रहता भीगा चेहरा सुंदरी-रूपसी

ओस से नहा आई वह है बासी 'सेउती'।

अनसूँघी केतकी के सुनहले पराग-कण

वह कन्हैया की वंशी, मतवाली करती जो वृंदावन

प्रकृति की कामनाओं के सौंदर्य-रंजित

कविता कल्पनामयी कवि के वह चिर वांछित।

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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