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Poetry & Stories
अजीब शय है के सूरत बदलती जाती है - अब्दुल हमीद
अजीब शय है के सूरत बदलती जाती हैये शाम जैसे मक़ाबिर में ढलती जाती है
दिल में जो बात है बताते नहीं - अब्दुल हमीद
दिल में जो बात है बताते नहींदूर तक हम कहीं भी जाते नहीं
एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैं - अब्दुल हमीद
एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैंदेखो हम भी क्या क्या कर के बैठ गए हैं
एक मिशअल थी बुझा दी उस ने - अब्दुल हमीद
एक मिशअल थी बुझा दी उस नेफिर अँधेरों को हवा दी उस ने
कभी देखो तो मौजों का तड़पना - अब्दुल हमीद
कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता हैये दरिया इतना पानी पी के प्यासा कैसा लगता है
अब्दुल हमीद: Quick Answers
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Kavishala has 13 poems and stories and 12 couplets (sher) by अब्दुल हमीद, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by अब्दुल हमीद
अजीब शय है के सूरत बदलती जाती है - अब्दुल हमीद
अजीब शय है के सूरत बदलती जाती हैये शाम जैसे मक़ाबिर में ढलती जाती है
दिल में जो बात है बताते नहीं - अब्दुल हमीद
दिल में जो बात है बताते नहींदूर तक हम कहीं भी जाते नहीं
एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैं - अब्दुल हमीद
एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैंदेखो हम भी क्या क्या कर के बैठ गए हैं
एक मिशअल थी बुझा दी उस ने - अब्दुल हमीद
एक मिशअल थी बुझा दी उस नेफिर अँधेरों को हवा दी उस ने
कभी देखो तो मौजों का तड़पना - अब्दुल हमीद
कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता हैये दरिया इतना पानी पी के प्यासा कैसा लगता है
ख़ाक बसर ले आई है - अब्दुल हमीद
ख़ाक बसर ले आई हैराह किधर ले आई है
किसी दश्त ओ दर से - अब्दुल हमीद
किसी दश्त ओ दर से गुज़रना भी क्याहुए ख़ाक जब तो बिखरना भी क्या
किसी का क़हर किसी की दुआ - अब्दुल हमीद
किसी का क़हर किसी की दुआ मिले तो सहीसही वो दुश्मन-ए-जाँ-आशना मिले तो सही
कितनी महबूब थी ज़िंदगी - अब्दुल हमीद
कितनी महबूब थी ज़िंदगी कुछ नहीं कुछ नहींक्या ख़बर थी इस अंजाम की कुछ नहीं कुछ नहीं
कुछ अपना पता दे कर - अब्दुल हमीद
कुछ अपना पता दे कर हैरान बहुत रक्खासरगर्मी-ए-वहशत का इम्कान बहुत रक्खा
पाँव रुकते ही नहीं ज़हन ठहरता ही नहीं - अब्दुल हमीद
पाँव रुकते ही नहीं ज़हन ठहरता ही नहींकोई नश्शा है थकन का के उतरता ही नहीं
साए फैल गए खेतों पर - अब्दुल हमीद
साए फैल गए खेतों पर कैसा मौसम होने लगादिल में जो ठहराव था इक दम दरहम बरहम होने लगा
Selected Quotes by अब्दुल हमीद (चुनिंदा उद्धरण)
फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता हैदिन गुज़रते हैं गुज़रते ही चले जाते हैं एक लम्हा जो किसी तरह गुज़रता ही नहींलौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है और ये हम कि अंधेरा कर के बैठ गए हैंउतरे थे मैदान में सब कुछ ठीक करेंगे सब कुछ उल्टा सीधा कर के बैठ गए हैंलोगों ने बहुत चाहा अपना सा बना डालें पर हम ने कि अपने को इंसान बहुत रक्खाये क़ैद है तो रिहाई भी अब ज़रूरी है किसी भी सम्त कोई रास्ता मिले तो सहीCouplets (Sher) by अब्दुल हमीद
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