आसमान के पार

योगेंद्र गौतमयोगेंद्र गौतम

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बचपन में आकाश के अनगिनत तारे देखकर

उन्हें गिनने का ख़याल आता था।

ख़ूब चाहता था, लेकिन गिन नहीं पाता था।

बड़े होने पर जब-जब बचपन की स्मृति लौटती

तब-तब गिनता था,

लेकिन तब भी नहीं गिन पाता था।

आज बरसती बूँदों को देखकर सोचता हूँ,

कि आकाश से सितारे

बारिश की बूँदें होकर बरस रहे।

ज़रा-सी खिड़की खोलकर देखता हूँ

तो आसमान में तारे नहीं दीखते

लगता है आसमान ने सारे तारे धरती पर बरसा दिये हैं इस रात।

लगता है धरणी की कोख में

आसमान तारे बो रहा है

आज।

लगता है : स्याह आसमान के पार

एक तालाब है

जिसमें सबरंग फूल खिलते हैं।

योगेंद्र गौतम
About the poet

योगेंद्र गौतम

नई पीढ़ी कवि-लेखक और अनुवादक।

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