ध्वनि और प्रकाश

योगेंद्र गौतमयोगेंद्र गौतम

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परदों के कनटोप ओढ़कर दीवार से टिकी खिड़की का मुँह

सूरज की पीठ पर खुलता है और

उसकी छजली पर उतरती है नवंबर की बच्चा धूप

बादलों की ओट में खड़े देवता

पृथ्वी पर अपने मंदिरों में अभी अवकाश-पत्र देकर आए हैं,

कहीं प्रार्थना का कोई शब्द नहीं सुनता

दीवार पर टँगी एक बुज़ुर्ग तस्वीर के पीछे की छाया

शांति की तहों में बैठी एक विवादास्पद गाथा है

कमरे में सन्नाटा है हालाँकि;

कक्ष के बाहर खड़े झाड़ के पीछे एक विचित्र कोलाहल में किसी सुंदर स्त्री की उसके प्रेमी को लगाई पुकार का व्यथित स्वर सुनाई पड़ता है...

इस दृश्य-कविता में मेरी भूमिका इस तस्वीर को इसके बाएँ निचले छोर से निहारते दर्शक की है,

जो अपना सिर उठाए और मुँह बाए जीवन-अजीवन की धरती पर खड़ा प्रकाश फाँकता है।

योगेंद्र गौतम
About the poet

योगेंद्र गौतम

नई पीढ़ी कवि-लेखक और अनुवादक।

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