बूढ़े पेड़ का मज़ाक़

हरि मृदुलहरि मृदुल

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बड़े इंतजार के बाद

हुई है मौसम की यह पहली बरसात

बच रहा हूँ मैं फिर भी बूँदों से

दौड़ा-दौड़ा आया हूँ इस बूढ़े पेड़ के नीचे

दौड़ पड़ी हैं चीटियाँ तने पर

मुझसे भी तेज़

मौसम आ चुका है

हिफ़ाज़त ज़रूरी

लंबी-चौड़ी घर-गृहस्थी!

तड़ातड़ पड़ रही हैं बूँदें

हालाँकि सकुचा भी रही हैं

पहला स्पर्श!!

पत्तियाँ कुछ ज़्यादा ही मस्ती में हैं

नाच रही हैं

ख़ूब नहाएँगी

फिर धूप में सुखाएँगी बदन

डाली भी झूमी

पत्तियों के पीछे-पीछे

मानो नाच रही बच्चियों को देख

माँ को आया ख़ुद का बचपन याद

और फिर लगी नाचने

मैं उजबक-सा यही सब निहार

ख़ुश हो रहा था

बिन छतरी बच ही गया

मुदित मन घर की राह निकल ही रहा था

इसी पल—हाँ—इसी पल

बूढ़े पेड़ ने किया मज़ाक़

हिली डालियाँ

हँसी पत्तियाँ

हवा चली

बूँद-बूँद जमा किया था

जो पानी

काफ़ी हद तक मुझे भिगो गया।

हरि मृदुल
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हरि मृदुल

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