पाते जाने (?) के क्रम में जाने कितना कुछ खो रहे हैं हम!
हम खो चुके हैं अपने संबंधी,
हम खो चुके हैं अपना प्रेम,
हम खो चुके हैं अपनी धरती,
हमारा आकाश पहले ही हमसे कभी छिन गया था,
जब हमने दिया था उसमें देवता को स्थान।
हमने ख़ुशबुओं के लिए पेड़ों को खो दिया है फूलों की क़ीमत पर,
हम औसत जीवन के लिए एक बेहतर मृत्यु खो चुके हैं।
हम अपनों के लिए ख़ुद को खो चुके हैं और अपने लिए अपनों को।
हम देश के लिए नागरिकों को खो चुके हैं...
उनकी छाती पर अब धर्म के झंडे सूखते हैं, उन्हीं के लहू में डूबे हुए...
हम गिरे संवाद की बिगड़ी सूरत में शब्दों के अर्थ खो चुके हैं,
हमारा दिन हमारी रात के गर्भ में सड़ चुका है।
स्त्री के सूखे गालों पर बहते आँसू की लकीर में हममें से बहुतों ने देह की नमी खो दी है।
हम अपनी आत्मा खो चुके पार्थिव पिंड हैं बस
शून्य में मुक्ति कामना को भटकते हुए प्रेत!








