रात को जब तुम्हारे केश खो जाएँगे
सघन अँधेरे में
और तुम्हारे चेहरे के आलोक्य से दमकता होगा चाँद
मैं तुम्हारी देह से एक सुबह मथ रहा होऊँगा...
जिसमें तुम्हारी पलकें छूते ही जाग उठेंगे सभी स्वप्न!
रात को जब तुम्हारे केश खो जाएँगे
सघन अँधेरे में
और तुम्हारे चेहरे के आलोक्य से दमकता होगा चाँद
मैं तुम्हारी देह से एक सुबह मथ रहा होऊँगा...
जिसमें तुम्हारी पलकें छूते ही जाग उठेंगे सभी स्वप्न!

रात फैली है, चाँद खिला हैआज पूरा चाँद है,
बचपन में आकाश के अनगिनत तारे देखकरउन्हें गिनने का ख़याल आता था।
पाते जाने (?) के क्रम में जाने कितना कुछ खो रहे हैं हम!हम खो चुके हैं अपने संबंधी,
मेरी आँखें धरती की आँखों के बहुत बाद खुली हैंपर अपनी आँखें खुलने के बाद मैं इसे जगे ही देखता हूँ
परदों के कनटोप ओढ़कर दीवार से टिकी खिड़की का मुँहसूरज की पीठ पर खुलता है और