बैजू बावरा

यतींद्र मिश्रयतींद्र मिश्र12 Sept 1977

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तुम्हारे पास नहीं थी दरबार में घुसने की कला

और बादशाह को असीसने वाली बंदिशें

तुम्हारा गला फँसता था

चापलूसी से गूँजने वाली तहरीरें सुनकर

और बेवजह ही ज़रदोज़ी वाली क़ालीनों पर

राग की बढ़त देखकर

तुम नहीं गाते थे

किसी अभियान का मंगलगान

और राजकुमारों के लिए सलोनी मुबारकबादियाँ

फिर भी तुम थे और इतिहास को

इस बात की ख़बर थी

कोई है जिसके शब्द और स्वर

उसकी बेपरवाह तंग गलियों से गुज़रकर भी

बादशाह के महलों तक पहुँच जाया करते थे

और जिसकी करुणा भरी आवाज़ में

रागिनियाँ पूरे भरोसे के साथ वज़ू करती थीं

इतिहास को यह भी मालूम था

तुम्हारी सुर ख़ानक़ाह में

यह संगीत ही था

जिसकी ताजपोशी होती थी बार-बार

और तुम्हारे अपने ही स्वर

सजाते थे सुर का तोरण

बजाते थे लय की दुंदुभी

यह तुम थे बैजू

जिससे इतिहास को कई दफ़ा

और कई बार संगीत को भी

ख़ुद को सुधारने का बहाना मिलता था

और दमकते हुए सूर्य को इस बात की आश्वस्ति

कि वह सुर के चेहरों पर भी

उजाले का प्रशस्त राग गा सकता था।

यतींद्र मिश्र
About the poet

यतींद्र मिश्र

सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित।

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