कजरी

यतींद्र मिश्रयतींद्र मिश्र12 Sept 1977

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काले रंग में भी इतना संगीत हो सकता है

यह इससे पहले कौन जानता था

और यह भी कि ज़्यादातर गाने वाले

इसमें इतने रंग कहाँ से भर देते हैं

कौन जानता था कि बरसते पानी

सनी मिट्टी और गँदले ताल के पास

प्रेम का इतना वैभव छिपा हो सकता है

और यह भी कि राधा ने

अपने संदेश के लिए मेघों से हहराते

इस मौसम को ही क्यों चुना

यह सब बातें भी कौन जानता था इससे पहले

कि इसे गाने से मायके में पड़ी लाड़ली की आँखें छलछला जाती हैं

और यह भी कि जाने वाला

लौटने में इतना वक़्त क्यों लगाता है।

यतींद्र मिश्र
About the poet

यतींद्र मिश्र

सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित।

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