सम्मोहित आलोक

यतींद्र मिश्रयतींद्र मिश्र12 Sept 1977

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कविता में जहाँ शब्द रखा है

चिमटे से उठाकर वहाँ अंगारा रख दो

अर्थ के सम्मोहित आलोक में

जहाँ मर्म खुलता दिखता हो

दीवट में उसके थोड़ा तेल भर दो

कुछ पल रुककर

ग़ौर से देखो उस तरफ़

जो झिप रहा

वह नेह भर बाती का उजाला है

जो चमक रहा

वह सत्य की दिशा में खुलने वाला रास्ता है।

यतींद्र मिश्र
About the poet

यतींद्र मिश्र

सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित।

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