जीवन भर ख़तरों से खेले, अब मरने का डर

यश मालवीययश मालवीय18 Sept 1962

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आरोही-अवरोही,

साँसों का है भारी स्वर

जीवन भर ख़तरों से खेले

अब मरने का डर

सूरज आसमान में

पश्चिम को जाता-सा दिखता

लाल रोशनाई से,

अपना विदा-गीत ख़ुद लिखता

अपना असर लगे हैं खोने

सारे छूमंतर

सूरजमुखी सिमटता-सा है

अपनी पंखुड़ियों में

बजने लगी शाम की बेला

चुप-चुप-सी घड़ियों में

पाँव थके, थकते हैं,

सपनों के पंछी के पर

जिससे अब तक खेले वो ही,

आग लगी डरवाने

छूट रहे साक़ी-मीना सब,

छूट रहे मैख़ाने

बैठे हम, गहरा ख़ालीपन

पैमाने में भर।

यश मालवीय
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यश मालवीय

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