आरोही-अवरोही,
साँसों का है भारी स्वर
जीवन भर ख़तरों से खेले
अब मरने का डर
सूरज आसमान में
पश्चिम को जाता-सा दिखता
लाल रोशनाई से,
अपना विदा-गीत ख़ुद लिखता
अपना असर लगे हैं खोने
सारे छूमंतर
सूरजमुखी सिमटता-सा है
अपनी पंखुड़ियों में
बजने लगी शाम की बेला
चुप-चुप-सी घड़ियों में
पाँव थके, थकते हैं,
सपनों के पंछी के पर
जिससे अब तक खेले वो ही,
आग लगी डरवाने
छूट रहे साक़ी-मीना सब,
छूट रहे मैख़ाने
बैठे हम, गहरा ख़ालीपन
पैमाने में भर।








