दुपहर का सन्नाटा
कड़वे स्वर में ऐंठा है
बिजली का है तार
तार पर कौआ बैठा है
तार फ़ोन का, एंटीना
या बँधी अलगनी है
बंद घड़ी क्या जाने
चलती साँस धौंकनी है
पश्चिम को जाते सूरज ने
किसको सेटा है?
पता भूख को है
आख़िर क्यों निकली अतड़ी है
खुला हुआ साफ़ा
औंधी-सी टोपी पगड़ी है
शक्ल न सिर शीशे में
केवल सजा मुरैठा है
क्या लुहार मोची कुम्हार
सब टूटे-टूटे हैं
ठाकुर साहब कहते हैं
ये बर्तन जूठे हैं
पंडित जी के मैले कपड़ों
संग बरेठा है
छनकर आए क्या कोई
विश्वास भरोसों से
है युगबोध
बात करता बस धुआँ पड़ोसों से
बहुत कसैला सच
इमली से बढ़कर कैथा है।








