है वही विस्मय

यश मालवीययश मालवीय18 Sept 1962

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छुआ कितनी बार तुमको

अनछुआपन है अभी तक

है यही विस्मय

कि जो पहले कभी था

सुना कितनी बार तुमको

अनसुनापन है अभी तक

है यही विस्मय

कि जो पहले कभी था।

भीगकर भी नहीं भोगे

धार में धँसना

लहर में खेलना यूँ तो हुआ

नींद भर सोई न रातें

चित्र कोई तरल होकर

आँख से अपनी चुआ

गुना कितनी बार तुमको

अनगुनापन है अभी तक

है वही विस्मय

कि जो पहले कभी था।

हुआ अपने बीच जो भी

अनहुआपन-सा लगे क्यों

धूप सच की, बारिशें ही पी गई

अनगिनत सपने फुहारें

किरन की कोमल उँगलियाँ

जी गई तारीख़, फिर-फिर जी गई

जिया कितनी बार तुमको

अनजियापन है अभी तक

है यही विस्मय

कि जो पहले कभी था।

बैठकर तट पर अकेले

मछलियों की बतकही को

नाव के मस्तूल को देखा किया

थिर हवाओं को हिलाते

ख़ुशबुओं की साँस भरते

अनदिखे से फूल को देखा किया

बुना कितनी बार तुमको

अनबुनापन है अभी तक

है यही विस्मय

कि जो पहले कभी था।

यश मालवीय
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यश मालवीय

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