झूठ बहुत सारे होते
सचमुच ही
सर्वांगसम नहीं होता है
कुछ भी
सांगोपांग सुनो तो
सारा किस्सा
इसमें इक चींटी का भी
है हिस्सा
नहीं अकारथ होता है
गुचगुच भी
पाओगे संवेदन
गहरे-गहरे
देखो कभी,
कलाकृतियों के चेहरे
हर रुचि को जीना होता
रुच-रुच ही
कण-कण में सूर्योदय
सजे सुनहरा
दिल्ली ही है नहीं
देश का चेहरा
हैं महत्त्व के,
भीटा और भरूच भी








