दिखलाओ ओ टी वी वालो!
इनको भी तो कभी कहीं
उरई, सागर, कटनी भी हैं,
दिल्ली पूरा देश नहीं
सिर्फ़ लखनऊ नहीं
कि कुंडा में भी इंसाँ रहते हैं
तुम राजधानी में जो सहते
वैसा वो भी सहते हैं
संत्री, मंत्री, नेता अफ़सर,
तुम जाते हो वहीं वहीं
भूख, महामारी, बीमारी
छोटे क़स्बे भी झेलें
एक निवाले की ख़ातिर भी
अपने जीवन से खेलें
गाँवों के हम रहने वाले
हम रहते हैं यहाँ, यहीं
चिकने चेहरे, छोटे परदे पर,
अपने को ही माँजें
तुम तक नहीं पहुँचतीं
तूती की हल्की-सी आवाज़ें
होश सँभाला, हमने जब से
तकलीफ़ें ही सिर्फ़ सहीं
दिल्ली पूरा देश नहीं








