दिल्ली पूरा देश नहीं

यश मालवीययश मालवीय18 Sept 1962

1 min read · 12.4K reads

दिखलाओ ओ टी वी वालो!

इनको भी तो कभी कहीं

उरई, सागर, कटनी भी हैं,

दिल्ली पूरा देश नहीं

सिर्फ़ लखनऊ नहीं

कि कुंडा में भी इंसाँ रहते हैं

तुम राजधानी में जो सहते

वैसा वो भी सहते हैं

संत्री, मंत्री, नेता अफ़सर,

तुम जाते हो वहीं वहीं

भूख, महामारी, बीमारी

छोटे क़स्बे भी झेलें

एक निवाले की ख़ातिर भी

अपने जीवन से खेलें

गाँवों के हम रहने वाले

हम रहते हैं यहाँ, यहीं

चिकने चेहरे, छोटे परदे पर,

अपने को ही माँजें

तुम तक नहीं पहुँचतीं

तूती की हल्की-सी आवाज़ें

होश सँभाला, हमने जब से

तकलीफ़ें ही सिर्फ़ सहीं

दिल्ली पूरा देश नहीं

यश मालवीय
About the poet

यश मालवीय

View profile & all 25 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीमुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयामैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजप्रतिज्ञाप्रतिज्ञाएँ बहा दो पानी में लड़कीप्रतिज्ञाएँ बहाओ पानी में;— बीरेंद्र चट्टोपाध्याय