जहाँ विलेन ही ख़ुद नायक हो
क्या कहिए ऐसे निज़ाम के
दिन सारे हैं तामझाम के
ख़ुद की ही नीलामी बोलो
झुलसे हुए पंख क्या खोलो?
उजियारे में होश गँवाकर
अँधियारे में सुई टटोलो
भरी लकीरों वाले चेहरे
दुपहरी के तेज़ घाम के
चलें किस तरह बाँह थाम के?
हरे पेड़ लू खाकर गिरते
पत्ता-पत्ता गीत बिखरते
अक्सर ही आईने राह में
अपने से मिलने से डरते
कोई नहीं किसी से मिलता
किस्से हैं बस सुबह-शाम के
मुरझाए चेहरे अवाम के
फेंक रहे तेज़ाब धर्म का
प्रवचन देते मगर मर्म का
इन्हें तनिक भी नहीं छू गया
कोर-किनारा,लाज-शर्म का
वो आख़िर फिर किसके होंगे
जो रहीम के, न ही राम के
ये तो हैं बस साम-दाम के








