गीत भी अब मन नहीं बहला रहे हैं

यश मालवीययश मालवीय18 Sept 1962

1 min read · 12.4K reads

अनमने हो,

घाव को सहला रहे हैं

गीत भी अब,

मन नहीं बहला रहे हैं

आग को आरंभ से

पहचानते थे

हम अबीते वक़्त का,

सच जानते थे

हम कि क्या थे

और क्या कहला रहे हैं

छंद में बँधकर,

स्वयं स्वच्छंद रहते

फूल होकर कब तलक

निर्गंध रहते?

हम कि अपने आपको,

टहला रहे हैं

एक चुप्पी का

अचानक चीख़ होना

देखते हम,

समय का तारीख़ होना

सोच बीता कल

कि दिल दहला रहे हैं।

यश मालवीय
About the poet

यश मालवीय

View profile & all 25 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like