सूंघ तो लेती है सबकुछ
सही और सटीक
बोलने से बचती है
संकोची है आंखों से भी ज्यादा
डरती है मर्यादा के मूर्तिभंजन से
इसलिए सांस लेने में संकट हो तब भी
अकसर चुप रहती है नाक
सूंघ तो लेती है सबकुछ
सही और सटीक
बोलने से बचती है
संकोची है आंखों से भी ज्यादा
डरती है मर्यादा के मूर्तिभंजन से
इसलिए सांस लेने में संकट हो तब भी
अकसर चुप रहती है नाक

#PratapSomvanshi अपने भीतर है जो इंसान बचाकर रखना अपनी मिट्टी की ये पहचान बचाकर रखना परिचय. जन्म : 2 नवंबर 1968.
View profile & all 38 Poems / Storiesअपने भीतर है जो इंसान बचाकर रखनाअपनी मिट्टी की ये पहचान बचाकर रखना
रोमी सैनिकों ने तुम्हें अपशब्द कहेक्योंकि उनके आका के पास
पसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है
पसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है
पसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है