वह सब जो छूट गया

उपांशुउपांशु

2 min read · 12.4K reads

 

एक

बंद आँखों के दृश्य
खिड़की से छिटक रही किरण की त्वचा पर
स्पंदन में सारे आँसू गँवा चुकी लौ पर तिलमिलाती अग्नि के अवश हो जाने से
धुँधलाती आकृतियों की तरह ओझल होते हैं जब
छूट चुकी गली के क्षितिज पर पहरा देने वाला पहाड़
रात का आवरण त्याग चर्म पर सुर्ख़ झंझावात से सराबोर आसरा बनता है
रौंओं की हरियाली में छनकर
सुनहले होते बहाव का किनारा जो उकेरती है बंद आँखों में
शीशे के गिलास में भरी जा रही फीकी चाय से घुलकर
रोशनी क्षीण कर देती है शहर के दृश्य
जो पगडंडियों से भयाक्रांत कोना एक ढूँढ़ते हैं
छूटते रंगों वाले कमरे में बिस्तर की छाँव का
जहाँ सुरक्षित है पायों की निगरानी में संदूक
सँजोया है जिसमें पुराने शहर को
बंद आँखों से देखने के लिए

दो

यद्यपि पुराना शहर पुराने घर की तरह होता है
जिसे छोड़कर जाने के बाद लौटना किसी अजनबी के यहाँ तफ़रीह करने जैसा है
जो लोग मिलते हैं मेज़बान
काग़ज़ के कटे, कूटों पर उकेरे गए, अजनबी चाय के प्याले ग़लत रखे गए मेज़ पर
सपनों का हिस्सा नहीं होते जिनमें फ़र्श और दीवारें दरवाज़ा बंद होने के बाद
और खिड़की खुली हुई हो तब भी
फेरे हुए कपड़ों की गंध लिए शहर ही हो जाते हैं
जो बुने हुए रेशों से जिस्म पर और फिर पूरे कमरे में
लौट आने पर साथ सोता है

तीन

रास्तों के मकड़जाल पर पर्यटनशील कोना तलाशती आँखें
क़ैद होती हैं सब्ज़ मैदान पर बिछी सुनहली चादर से
जो पौ फटते ही बह आती है पिघलकर दूर टँगे एक पहाड़ से
जिसकी त्वचा तीव्र प्रकाश के रक़्स में स्याह तेज से झिलमिलाती है
आँखें निराकार परछाइयाँ बंद होने पर ही देख पाती हैं
क्योंकि सदी के छूट जाने के बाद आकृतियाँ बग़ैर परछाईं के तराशी जाती हैं
ढँके हुए संसार में अमूमन दूसरा कोई नहीं रहता
जहाँ सिवाय आँखों के पर्यटनशील होने की मृगतृष्णा के
जो लौटने के वायदे पूरे न किए जाने पर डेरा जमा लेती हैं रातों में—
कमरे की वास्तविकता से खिन्न

चार

दूसरे की नज़र से अपना शहर देखना दूसरे के नज़रिए पर ग़ौर करना है

यह ज़रूर है कि हर जिस्म पर शहर की एक जैसी बू छूटती है
लेकिन लौटने के बाद रातों को कमरे में सो रहा शहर
एक नहीं होता

अपने पुराने घर में किसी और के डेरे का सबूत है दीवारों की रंगत से हुई छेड़खानी
फिर भी फ़र्श पर किसी अनदेखे कोने में
जो फ़िलहाल अलमारी या किसी मेज़ का आसरा होने की वजह से वैसी है
पुराने दीवारों की गवाही देती है

उपांशु
About the poet

उपांशु

नई पीढ़ी के कवि-लेखक। मूल नाम : उपांशु जन्म : पटना, बिहार

View profile & all 19 Poems / Stories

More from उपांशु

  1. तुम्हारे लिए चीज़ हो जाना

    कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे कमरे की दीवार हो जाऊँकि तुम थक कर टिका लो अपनी पीठ

    12.4K reads
  2. शहर के लिए एक और कविता

    जब दुपहर की धूप आँखों पर अँधेरे का पर्दा खींचने आती हैजब उसकी ऊष्म किरणें पसीने से सनी मेरे देह को

    12.4K reads
  3. मृत्युंजय

    संदर्भ : कुछ मुँह फेर लेते हैं और कुछ अपनी आत्मा पर बोझ बनने देते हैं। क्या नहीं देखा है हमने सशक्त लोगों की तरस का फल! आख़िरी क्षण ये एक कैंसर पीड़ित के ज़रूर हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा सत्य केवल इसी घटना से बँधा नहीं है।Pity me that the heart is slow to learn

    12.4K reads
  4. किनारे

    दूर,बहुत दूर

    12.4K reads
  5. मेरी अमानत

    एकयाद दो वक़्त ही सही आ जाती है किसी दूसरे शहर की गली में आहिस्ता क़दम बढ़ाते हुए

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like