About उपांशु
नई पीढ़ी के कवि-लेखक। मूल नाम : उपांशु जन्म : पटना, बिहार
Selected Quotes
Poetry & Stories
तुम्हारे लिए चीज़ हो जाना
कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे कमरे की दीवार हो जाऊँकि तुम थक कर टिका लो अपनी पीठ
वह सब जो छूट गया
एकबंद आँखों के दृश्य
शहर के लिए एक और कविता
जब दुपहर की धूप आँखों पर अँधेरे का पर्दा खींचने आती हैजब उसकी ऊष्म किरणें पसीने से सनी मेरे देह को
मृत्युंजय
संदर्भ : कुछ मुँह फेर लेते हैं और कुछ अपनी आत्मा पर बोझ बनने देते हैं। क्या नहीं देखा है हमने सशक्त लोगों की तरस का फल! आख़िरी क्षण ये एक कैंसर पीड़ित के ज़रूर हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा सत्य केवल इसी घटना से बँधा नहीं है।Pity me that the heart is slow to learn
किनारे
दूर,बहुत दूर
About उपांशु
नई पीढ़ी के कवि-लेखक।
मूल नाम : उपांशुजन्म :पटना, बिहार
नई पीढ़ी के कवि-लेखक। Kavishala has 19 poems and stories by उपांशु, free to read on this page, along with selected quotes you can share.उपांशु: Quick Answers
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Poems & Stories by उपांशु
तुम्हारे लिए चीज़ हो जाना
कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे कमरे की दीवार हो जाऊँकि तुम थक कर टिका लो अपनी पीठ
वह सब जो छूट गया
एकबंद आँखों के दृश्य
शहर के लिए एक और कविता
जब दुपहर की धूप आँखों पर अँधेरे का पर्दा खींचने आती हैजब उसकी ऊष्म किरणें पसीने से सनी मेरे देह को
मृत्युंजय
संदर्भ : कुछ मुँह फेर लेते हैं और कुछ अपनी आत्मा पर बोझ बनने देते हैं। क्या नहीं देखा है हमने सशक्त लोगों की तरस का फल! आख़िरी क्षण ये एक कैंसर पीड़ित के ज़रूर हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा सत्य केवल इसी घटना से बँधा नहीं है।Pity me that the heart is slow to learn
किनारे
दूर,बहुत दूर
मेरी अमानत
एकयाद दो वक़्त ही सही आ जाती है किसी दूसरे शहर की गली में आहिस्ता क़दम बढ़ाते हुए
आत्मबोध के बाद विकास के लिए लिखे गए कुछ वाक्य
इंसान बनने से पहले आप सीख ही जाते हैंकि आँखें मूँदकर
आशिक़ी अश्क़ के बहाने सब्र भी दे जाए कभी
जब कभी यह ख़याल कि बस अब और प्यार नहीं कर सकता मैं तुमसे आता है, मैं पूछता हूँ—तुम्हारी आत्मा पर लगी चोटों को भरते देखने की कल्पना करते हुए,
अपनी ज़मीन
हरे समंदर की करियाती गहराई आवास जिस किसी दैत्यकायी जंतु का हो आसरे से बढ़कर और क्या हो सकता है?क्या आसरा नहीं छोटी-छोटी ईंटों के ये दैत्यकायी मकान दीवारों पर अमूमन खोई रहने वाली छिपकलियों का?
स्वान्तः सुखाय
क़ीमत लगाई जाए तो उन शब्दों को किस दाम पर बेचा जाएगाजो डायरी में नहीं देख पाती हैं आँखें—
जो अब देखना भूल चुके हैं
शहर की वे गलियाँ जो टूटी हुई ईंटों से रँगी गईं, घिरी हैं आसरों से जिन्हें मकानों के तर्ज़ पर गीली मिट्टी में तिनके और प्लास्टिक घोल कर, दीवारों पर गोइठे ठोंक कर और फ़र्श पर गोबर नीप कर घर बनाया गया।जहाँ सोती है हर सर्द रात स्वप्न देखने वालों के केशों में नदी धूप निकलते ही ओस की बूँदों-सी सूख जाने वाली।
और… प्रेम?!
और क्या ही मिला रातों की बेपरवाही में उन्हें,दैहिक सुख की लालसा में जो, क्षीण होते रहे परस्पर?
Selected Quotes by उपांशु (चुनिंदा उद्धरण)
तत्पश्चात् एक जैसे भ्रम से भी कि कुछ किया जाना चाहिए भ्रमित होने का सत्य तो केवल भ्रमणार्थ भ्रमित होने तक ही सीमित है।हरे समंदर की करियाती गहराई आवास जिस किसी दैत्यकायी जंतु का हो आसरे से बढ़कर और क्या हो सकता है?जब दुपहर की धूप आँखों पर अँधेरे का पर्दा खींचने आती हैजब उसकी ऊष्म किरणें पसीने से सनी मेरे देह कोसंदर्भ : कुछ मुँह फेर लेते हैं और कुछ अपनी आत्मा पर बोझ बनने देते हैं।कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे कमरे की दीवार हो जाऊँकि तुम थक कर टिका लो अपनी पीठइंसान बनने से पहले आप सीख ही जाते हैंकि आँखें मूँदकरVideos on उपांशु
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