कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे कमरे की दीवार हो जाऊँ
कि तुम थक कर टिका लो अपनी पीठ
और केवल होने भर को लेकर गुमान करना मैं भी कुछ सीख सकूँ।
इंसान नहीं, ठंडी दीवार से अड़ी तुम्हारे देह की सिहरन हो जाना चाहूँगा
मेरी आदमियत चाहकर भी तुमसे ऐसी नग्नता से नहीं लिपट सकती।
ज़रूरी हो जाता है तुमसे दूर जाना अक्सर
मैं भूल जाया करता हूँ कि जिस शहर की हवा में तुम्हारी उछ्वास नहीं होती वहाँ महज़ साँस लेने से ही फेफड़े छिलने लगते हैं।
तुमसे दूर साँसों से छिलता रहा मेरा गला, फेफड़ों में भरता रहा
सोचता हूँ और कितने ज़ख़्म मुकर्रर हैं इस तंग नली को
कि लाश देखने वाले कहे इसने पूरा जी लिया।
यह पढ़कर तुम झिड़क दोगी, मैं जानता हूँ, पास रहा तो चूम लोगी,
मैं जानता हूँ, कहोगी व्यर्थ है ऐसा चिंतन कि प्रेम करती हूँ तुमसे, कहीं भी रहो।
तुम्हारा चुंबन सोच लेने के बाद भी मुझे भान रहेगा कि हर क्षण लाश बनने की क़वायद ही है
भले ही कभी सोचा नहीं मैंने कि बड़े होने के बाद लाश बनना चाहूँगा;
तुम्हारा मुझसे प्रेम करना मुझे ज़िंदगी से तो बचा नहीं सकता न।
साँस ले पाना वाबस्ता है चीज़ हो जाने की प्रक्रिया से
यदि चुनाव करने दिया जाए तो मैं तुम्हारा कुछ हो जाना चाहूँगा
जिसकी ज़रूरत ताउम्र तुम्हें रहे।
ऐसी क्यों नहीं है दुनिया कि तुम्हारे लिए चीज़ हो जाने को अपना
पेशा कहा जा सका।
ये कैसा आडंबर है कि चीज़ हो जाना ही ज़िंदगी है,
यहाँ हर क्षण मैं क़तरा-क़तरा अपनी आत्मा गँवाता हूँ,
ऐसी क्यों है दुनिया कि पेशे के लिए ऐसा करना ही मुझे सफल बनाता है।
मैं समझ रहा हूँ कि आत्मा को गँवा देना गर्व की बात है
और तुम्हारे लिए साँस हो जाना तुच्छतम नीचता।
मैं फिर भी तुम्हारे लिए साँस हो जाना चाहूँगा
कि मैं नहीं चाहता कोई कहे तुमने पूरा जी लिया।








