ये हिर्स-ओ-हवस के सौदाई आदाब-ए-मोहब्बत क्या जानें
ये इश्क़ के मा'नी क्या समझें ये हुस्न की क़ीमत क्या जानें
हम चूमते रहते हैं हर दम फ़ितरत की हसीं पेशानी को
आज़ाद-मनश हम अहल-ए-नज़र क़ानून-ओ-शरीअ'त क्या जानें
हो ख़ौफ़-ए-जहन्नम जिस में निहाँ जन्नत की हवस हो जिस में अयाँ
अल्लाह के सादा-दिल बंदे हम ऐसी इबादत क्या जानें
हों फूलों की सेजें जिन के लिए काँटों की चुभन क्या समझेंगे
जिन के न लगी हो चोट कभी वो दर्द की लज़्ज़त क्या जानें
जो सीम-ओ-ज़र में तोलते हैं कौनैन की हर इक जिंस-ए-गिराँ
इंसान के दिल की क़ीमत को वो साहब-ए-दौलत क्या जानें
इंसान जहाँ भी पाते हैं हम दिल से उसे अपनाते हैं
ये मज़हब-ओ-मिल्लत के झगड़े हम अहल-ए-मोहब्बत क्या जानें








