बर्क़-रफ़्तार ज़माना है थका देगा तुम्हें
इक ज़रा दम भी जो लोगे तो गिरा देगा तुम्हें
कश्ती-ए-नूह कोई ढूँडो हिफ़ाज़त के लिए
नीस्ती का ये जो तूफ़ाँ है डुबा देगा तुम्हें
तुम ने क्यों गुलशन-ए-फ़ितरत को है पामाल किया
बाग़बाँ गुलशन-ए-फ़ितरत का सज़ा देगा तुम्हें
तुम को ख़ुद लड़ना है इस दौर के फ़िरऔ'नों से
हाथ में कोई न मूसा का असा देगा तुम्हें
कारवाँ बे-सर-ओ-सामाँ है तो रहबर नादाँ
कौन खोई हुई मंज़िल का पता देगा तुम्हें








