गुड़

हरि मृदुलहरि मृदुल

1 min read · 12.4K reads

चुनौती थी चीनी की

और नगर के धनी की

इसीलिए चने का साथ छूटा

टूटी दोस्ती पानी की

भूल ही चुके स्वाद

मीठी बानी

कितने तो क़िस्से

कहानी

सब बातें गुम हो गईं नानी की

लेकिन कल कमाल हो गया

दीख गया मुझे वही गुड़़

‘बिग बाज़ार’ में

पारदर्शी पन्नी में पैक

बीसियों महँगी चीज़ों के बीच

पूरी महक के साथ मुस्काता

चकित हो जिसे देखता रहा

बार-बार मैं

हरि मृदुल
About the poet

हरि मृदुल

View profile & all 50 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like