सीढ़ियों पर खेत

हरि मृदुलहरि मृदुल

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सात साल के बेटे का सवाल सुनकर

सोच में पड़ गया मैं

कोई जवाब नहीं दे पाया

पुश्तैनी घर दिखाने के लिए

एक पुराना एलबम निकाला था

एलबम क्या था

यादों का पिटारा था

पहाडी पर बसा गाँव और

सीढ़ियों जैसे खेत

सीढ़ियों जैसे खेतों ने तो

बेटे को ख़ूब आकर्षित किया

लेकिन उसके लिए एक मटमैले धब्बे जैसे दिखते

पुश्तैनी घर का कोई आकर्षण नहीं था

बेटे ने एक अनूठी बात पूछी :

'पापा, किसने किया यह जादू कि

सैकड़ों सीढ़ियों को

हरे-भरे खेतों में बदल दिया?'

‘तुम्हारे दादा के दादा के दादा के भी दादा ने

किया था यह जादू

उन्होंने ही पहाड़ों को सीढ़ियों में बदला

और सीढ़ियों को खेतों में

इन खेतों को वह बाघों के कंधों पर

जुआ रखकर जोतते थे

परियाँ-आचरियाँ आती थीं बीज बोने

तुम्हारी दादी की दादी की दादी की भी दादी का

हाथ बँटाने...’

मेरी अजब-ग़ज़ब बातों से वह

ख़ासा रोमांचित हो गया था

बावजूद इसके बड़ी गंभीरता से उसने सवाल किया :

‘पापा, आप भी कमाल करते हैं

मेरा उत्तराखंड

मेरा चंपावत

मेरा बगोटी

बोलते रहते हैं...

जिन खेतों की सीढ़ियों को चढ़ते हुए

इस बड़े शहर पहुँचे थे

उन्हीं सीढ़ियों से उतरते हुए

वापस गाँव भी तो जा सकते हैं आप?'

हरि मृदुल
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हरि मृदुल

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