एक कतार में खड़े होकर अपने यारों के संग जब
झुका मैं बंदूक़ रखने को ख़ालमख़ाली
मुझे लगा पहली बार नमाज़ पढ़ी मैंने
सिजदा किया
या इलाही
मस्जिद का मीनार तुम्हारे क़दमों में रखा है
फिर न मेरे कंधों पर रखना
तुम्हारी ख़ातिर और लड़ाई अब मैं नहीं लड़ूंगा।
एक कतार में खड़े होकर अपने यारों के संग जब
झुका मैं बंदूक़ रखने को ख़ालमख़ाली
मुझे लगा पहली बार नमाज़ पढ़ी मैंने
सिजदा किया
या इलाही
मस्जिद का मीनार तुम्हारे क़दमों में रखा है
फिर न मेरे कंधों पर रखना
तुम्हारी ख़ातिर और लड़ाई अब मैं नहीं लड़ूंगा।

पंजाबी के सुप्रतिष्ठित कवि, आलोचक, अनुवादक और संस्कृति-समीक्षक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।
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