नमाज़

हरभजन सिंहहरभजन सिंह

1 min read · 12.4K reads

एक कतार में खड़े होकर अपने यारों के संग जब

झुका मैं बंदूक़ रखने को ख़ालमख़ाली

मुझे लगा पहली बार नमाज़ पढ़ी मैंने

सिजदा किया

या इलाही

मस्जिद का मीनार तुम्हारे क़दमों में रखा है

फिर न मेरे कंधों पर रखना

तुम्हारी ख़ातिर और लड़ाई अब मैं नहीं लड़ूंगा।

हरभजन सिंह
About the poet

हरभजन सिंह

पंजाबी के सुप्रतिष्ठित कवि, आलोचक, अनुवादक और संस्कृति-समीक्षक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 18 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like