कल रात
आँखों से स्याही भरकर
एक पत्र लिखा
न जाने किसकी प्रतीक्षा में
किसकी प्रतीक्षा के लिए
जिसके अक्षरों में
पलकों में अटकी ओस सजाई
छोटे-छोटे शिकवों के हाशिए छोड़े
हाँफते प्यार के चिह्न लगाए
विश्वास की मात्राएँ
विराम चिह्न
अनुभव की वर्णमाला पर सजाकर
शब्दों में दो साँसों जितना फ़ासला छोड़कर
एक उम्र का अर्थ भरा
इससे पहले
कि पत्र तुम तक पहुँचाता
तुम अपने पते-ठिकाने सहित
खो गए
विश्वास की तरह
अंततः मेरे नाम ही लौट आए
अब पत्र की दस्तक के लिए द्वार
मेरे साँसों की चौगाठ थी
मेरी दलहीज़।








