लड़की हैरान है
देह के जंगल में मिरग कस्तूरी का
शाहरग के पास-पास सपना बहुत दूरी का
ख़ुशबू के दरिया में
बही जाती जान है
जिस्म की खिड़की में चंद्रमा चमकते
दिन-दहाड़े सपने देखते
अचानक चौंक उठते हैं
दुनिया न जान ले
मन के अँधेरे में जो रौशन जहान है
चलती चली जाती है
कपड़ों की ओट में चंद्रमा छिपाती है
नज़रों के काँटों में
बार-बार लगता जैसे ओढ़नी अटक जाती है
ख़ुशबू के भ्रमजाल मिरग हलकान
अपने ही होने से लड़की परेशान है।
मुश्किल है हथेली पर चाँद रख कर चलना
बहुत दुश्वार सदा कली जैसे खिलना
बैठना अकेले और कुछ भी न सोचना
अपनी ख़ामोशी को बोलने से रोकना
छेद-छेद मटकी में दरिया को बाँध चली
उमर नादान है।








