आँखों और कलेजे को
आनंदित कर देने हेतु
माता प्रकृति ने
सृजा दिया
मिट्टी में से कुसुम एक।
उस नव वर सुमन को देख हुआ कवि
अचंभित—पुलकित।
कवि ने भी मन में एक
कमनीय कुसुम का किया सृजन।
उसके दिल में लहरा उठीं
नव-नव उल्लास की तरगें।
दोनों ने पाई उज्ज्वल शोभा
पर, कौन किससे है आगे—
यह तो कहते न बना था।
आश्चर्य यह तो रहा था।
काल ने डाली छाया अपनी
उन दोनों के ऊपर, निर्मम
मिट्टी का कुसुम बना निस्तेज
काल की अग्नि में झुलसकर
भावना की संतान मनोहर फूल
लसित हुआ जैसे उजला तारा।








