मैं एक बाँसुरी हूँ।
मुझमें से, अविराम गति से
आनंदमय गीतों की
अमृत निर्झरी
प्रवाहित हो रही है।
यह सारा जगत
मेरे मोहक गीतों का आस्वादन कर
दिन-ब-दिन
स्नेह-मधुर बनता जा रहा है।
यौवन के उन्मेष से पूर्ण
आर्द्र हृदय में
रागात्मक आकुलता का
सृजन करने वाले मधुर विकार
जब मेरे गीत में ध्वनित होते हैं
तब
सारा विश्व
उस माधुरी से
सांद्र धारा में
लयीभूत हो जाता है।
मेरे लिए इस जगत में
इस प्रकार प्रेमगानालाप करना ही है,
और कोई भी कर्तृत्व
शेष नहीं रह गया है।
मेरे गीतों की तरंगें,
जो लोल एवं कोमल हैं
जगत और जीवन को मधुर बनाती हैं,
इसलिए,
यदि मैं मिट्टी में पड़कर
चाहे, गल जाऊँ तब भी
मेरा मनोहर गीत सदैव
प्रतिध्वनित होता रहेगा।








