शाश्वत सौंदर्य

एम. पी. अप्पनएम. पी. अप्पन

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प्रिये, मुझे कभी परितृप्ति होती नहीं,

तेरे सौंदर्य-सुधारस का

मैंने कितना आस्वादन किया,

फिर भी।

तेरे अंग-प्रत्यंग की मोहक कांति

दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है।

तू वसंत, शरत् जैसी ऋतुओं में

नव-नव श्री से प्रसन्न रहती है।

प्रतिदिन तेरे मुख-मंडल पर

अनवद्य नव सौंदर्य स्फुरित होता है।

जीवन के प्रभात में,

जब मुझे तेरे प्रथम दर्शन प्राप्त हुए

तब मेरे अंतर्मन में

जो आनंद की लहरें उठीं

वे आज भी मेरी शिराओं से दौड़ती हैं।

उस समय जो शोभा तुझमें देखी

आज भी वह तुझमें दर्शित होती है।

तेरा प्रेम नित्य लावण्यमय है

फिर, तेरी कांति

शाश्वत होती है, तो क्या आश्चर्य?

एम. पी. अप्पन
About the poet

एम. पी. अप्पन

‘महाकवि’ के रूप में सुप्रतिष्ठित मलयाली कवि।

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