स्वातंत्र्य दिन

एम. पी. अप्पनएम. पी. अप्पन

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सस्मित आगत होता है, तू फिर

उज्ज्वल छविमान, हे स्वाधीनता दिन!

जो नव उन्मेष-आलोक आज फैलता

कल तक न दीखा वह अम्बर में भूमि में

मेरी मन-लतिका में शत-शत सुरभित

सुमन विक्रमित होते जाते हैं।

हे, सुंदर सुदिन, तेरी मनहर शोभा

हमारे लिए प्राणों से भी प्रिय है।

हम इस प्रभात-प्रकाश में मिलकर

प्रण करते हैं—तुझे हम देंगे

सदैव आयु औ’ नीरोगता इस भाँति।

हथियार लिए बिना, न किसी की हत्या कर

हमने आर्ष-भू-तनयों ने पाया स्वातंत्र्य!

उसे नयन जल से भिगोने न देंगे हम

उसे रक्त में न सने जाने देंगे हम।

एम. पी. अप्पन
About the poet

एम. पी. अप्पन

‘महाकवि’ के रूप में सुप्रतिष्ठित मलयाली कवि।

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