सस्मित आगत होता है, तू फिर
उज्ज्वल छविमान, हे स्वाधीनता दिन!
जो नव उन्मेष-आलोक आज फैलता
कल तक न दीखा वह अम्बर में भूमि में
मेरी मन-लतिका में शत-शत सुरभित
सुमन विक्रमित होते जाते हैं।
हे, सुंदर सुदिन, तेरी मनहर शोभा
हमारे लिए प्राणों से भी प्रिय है।
हम इस प्रभात-प्रकाश में मिलकर
प्रण करते हैं—तुझे हम देंगे
सदैव आयु औ’ नीरोगता इस भाँति।
हथियार लिए बिना, न किसी की हत्या कर
हमने आर्ष-भू-तनयों ने पाया स्वातंत्र्य!
उसे नयन जल से भिगोने न देंगे हम
उसे रक्त में न सने जाने देंगे हम।








