पीछे की ओर देखा

एम. पी. अप्पनएम. पी. अप्पन

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आधी उम्र बीत गई—

यह सोचकर हृदय में

आई व्याकुलता;

तब

देखने लगा पीछे की ओर।

आँसू और हास से मेरे

कोटि-कोटि कर्म

गुँथे पड़े हैं, जिन्हें

मैं करने लगा, पृथक कर देखने।

कभी चाहा नहीं छाया को

कभी देखा नहीं निस्सार पर

मुझे लगे थे बराबर दोनों—

मिट्टी का टेला और सोना

चाहा केवल संसार का

आनंद केवल आनंद

मैं नहीं देखता अपने लिए

कुछ भी; बताता हूँ सही

स्नेह किया जगत का मैंने

स्नेह मिला जगत से मुझे

क्या चाहिए बढ़कर इससे

धन्य हूँ, मेरा जीवन बना धन्य।

एम. पी. अप्पन
About the poet

एम. पी. अप्पन

‘महाकवि’ के रूप में सुप्रतिष्ठित मलयाली कवि।

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