जैसे-जैसे उमर बढ़ती जाती है हमारे दिमाग़ में स्मृतियों
का ख़ज़ाना बनने लगता है। ख़ज़ाने में लगातार और-और
स्मृतियों के आते-आते रहने से खनखनाहट पैदा होती है
और इस खनखनाहट की वजह से हम हमेशा चौकन्ने रहते
हैं या बेतरतीब।
हम कभी भी अपनी स्मृतियों से पीछा नहीं छुड़ा सकते
स्मृतियाँ हमें ज़ंग की तरह पकड़े होती हैं या हम
स्मृतियों को। यह ज़ंग छुड़ाने से भी नहीं छूटता और
यदि छूटता भी है तो काला-सा निशान छोड़ जाता है,
कि देखो यहाँ कभी मैं था, मैं जिसे तुमने लाख छुड़ाना
चाहा, पर मैं, मैं हूँ अपना देश बदलकर प्रकट होता हुआ।
ऐसा करें कि हम स्मृतियों को कहीं आकाश में छुपा दें या
उन्हें, प्यारे बादलों से ढँक दें या
ग्रहों को कह दें कि इन्हें संभाल कर रखें।
नदियों से कह दें कि इन्हें अपनी छाती में जगह दें।
अग्नि से कहना होगा कि इन्हें जलाएँ नहीं।
ख़ूँख़ार मनुष्यों से कहें, वे इन्हें रौंदे नहीं।
पर हम स्मृतियों के बारे में पृथ्वी से क्या कहेंगे?
शायद पृथ्वी हमारी स्मृतियों को बचाकर रखेगी
हमारे फिर से आने तक।








