(तरुण कवियों के हाथ में)
स्वप्न-वाटिका छूकर आते हुए मेरे इन शब्दों में जीवन-धारा की सुषमा
समय का अंतरंग उत्ताप मेरा कोई अपना आविष्कार नहीं है
मेरे भीतर जैसे किसान, मैं शब्दों को चखकर देखता हूँ
किस का क्या स्वाद, हथेली में लेकर महसूस करता हूँ
कितना ताप है उन में
मैं जानता हूँ, शब्द मनुष्य की महान सृष्टि की तेजोमय संतान हैं,
मैं एक साधारण कवि,
कंधा बदल-बदल ढोकर लाए इन शब्दों में
मनुष्य का करुण अनुभव और इतिहास की निष्ठुर खरोंच।








