वह औरत जंगल से
लकड़ियाँ बीनकर लाती है
और मेरे लिए खाना पकाती है।
कमरे में भर गई है
जंगली लकड़ियों की गंध
धुएँ का स्वाद रोटियों से होकर
हलक़ के नीचे पहुँचता है और
मैं जंगल होने लगता हूँ।
उसका प्यार जंगली पत्तों के के सुगंध की तरह
उसकी आँखों से होकर
उसके सपाट चेहरे पर उतरता है।
मुझे रह-रहकर याद आने लगता है
सागौन का वृक्ष
मैं उसके चेहरे को अपने हाथों में
भर लेना चाहता हूँ।
पर मुझे लगता है जैसे मैंने
एक वृक्ष को काटना चाहा है
और वृक्ष है कि खड़ा हुआ।








