वृक्ष काटना

भगतसिंह सोनीभगतसिंह सोनी

1 min read · 12.4K reads

वह औरत जंगल से

लकड़ियाँ बीनकर लाती है

और मेरे लिए खाना पकाती है।

कमरे में भर गई है

जंगली लकड़ियों की गंध

धुएँ का स्वाद रोटियों से होकर

हलक़ के नीचे पहुँचता है और

मैं जंगल होने लगता हूँ।

उसका प्यार जंगली पत्तों के के सुगंध की तरह

उसकी आँखों से होकर

उसके सपाट चेहरे पर उतरता है।

मुझे रह-रहकर याद आने लगता है

सागौन का वृक्ष

मैं उसके चेहरे को अपने हाथों में

भर लेना चाहता हूँ।

पर मुझे लगता है जैसे मैंने

एक वृक्ष को काटना चाहा है

और वृक्ष है कि खड़ा हुआ।

भगतसिंह सोनी
About the poet

भगतसिंह सोनी

भगतसिंह सोनी

View profile & all 7 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like