क़लम के छर्रे

बच्चा लाल 'उन्मेष'बच्चा लाल 'उन्मेष'

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तय करेंगे मेरी नियति, वे सिक्का उछाल के

फिर खेलेंगे गोल्फ़, मेरी बस्ती उजाड़ के।

अब के सैयादों की सौदागीरी है कुछ अलग

बेचेंगे हमीं को मांस, हमीं को मार के।

खप गए, मर गए, उनके खेतों में खट-खटके

दीन के दिन लौटे हैं कब, दिन यूँ गुज़ार के।

कि सब दिन हो एक-सा, मुमकिन नहीं यहाँ

देखें हैं हमने भी कई, पतझड़ बहार के।

बह जाते हैं जमाख़ोरों के,महँगे से महँगे काजल

जब भी बही कोई निश्छल नदी, आँख फाड़ के।

वे बता रहे हैं कि कैसे इज़्ज़त ढकी रहे

जो बैठे हैं ख़ुद आँखों की, अस्मत उतार के।

तुम्हारी बंदूक़ों के छर्रे, तो मेरे क़लम के

हमने भी क़लम चलाई आज, जंग में उतार के।

झूठी है वो इल्म और इल्म की जम्हूरियत

जो काम कभी न आ सके, जन-जवार के।

बच्चा लाल 'उन्मेष'
About the poet

बच्चा लाल 'उन्मेष'

सुपरिचित कवि। 'कौन जात हो भाई', 'छिछले प्रश्न गहरे उत्तर' और 'बहार के पतझड़' शीर्षक से तीन कविता-संग्रह प्रकाशित।

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