लाओ तुम्हारे गंगा-जल को छूकर
अपवित्र कर दूँ
तुमने ही तो बख़्शी है शक्तियाँ
मज़बूत और टिकाऊ
गंगा से कहीं ज़्यादा कड़क
छू लूँ तो गंगा भी गंगा नहाए
और तुम्हारे दैविक मंत्र भी
उसके काम न आएँ
जैसे नहीं आए काम अब तक
हमारे…
लाओ तुम्हारे गंगा-जल को छूकर
अपवित्र कर दूँ
तुमने ही तो बख़्शी है शक्तियाँ
मज़बूत और टिकाऊ
गंगा से कहीं ज़्यादा कड़क
छू लूँ तो गंगा भी गंगा नहाए
और तुम्हारे दैविक मंत्र भी
उसके काम न आएँ
जैसे नहीं आए काम अब तक
हमारे…

सुपरिचित कवि। 'कौन जात हो भाई', 'छिछले प्रश्न गहरे उत्तर' और 'बहार के पतझड़' शीर्षक से तीन कविता-संग्रह प्रकाशित।
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