डूबा है परिवार उधर,
मृत सदस्य के शोक में
अवसर देख गिद्ध इधर,
टूट पड़े हैं भोग में।
क्या बूढ़ा, जवान क्या?
निर्धन और धनवान क्या?
मृत्यु सेज के गिर्द घूमकर,
लेता है जलपान क्या?
शर्म नहीं आई तनिक भी
जा बिके हो थोक में
अवसर देख गिद्ध इधर,
टूट पड़े हैं भोग में।
धूर्तों ने अजब रस्म चलाई
मरे बाप या मर जाए माई,
खाकर ढेकरे बैठे हैं ये
जो एक दिन की बच गई कमाई,
चाहे तो मर जाए बच्चा
मृत माँ के ही कोख में,
अवसर देख गिद्ध इधर,
टूट पड़े हैं भोग में।
ज़िंदा थे तब तो अछूत थे
पीते उपेक्षा की घूट थे,
जो ब्राह्मण ख़ुद को देवता कहता
उसकी नज़रों में हम भूत थे,
जीते जी तो नर्क में झोंका
मरने पर ठेले स्वर्ग लोक में?
अवसर देख गिद्ध इधर,
टूट पड़े हैं भोग में।
मानवता की बेशक हार है
जब साँसों की टूटती तार है,
हुई राख ठंडी भी नहीं
कि मृत्यु भोज बनकर तैयार है,
कौन मरा ग़ुरबत में यहाँ?
न देखो, कौन मरा यहाँ रोग में?
अवसर देख गिद्ध इधर,
टूट पड़े हैं भोग में।
गर इतना है कि सँभलता ही नहीं
तो उस घर को दे दो,
जहाँ दीया तक जलता नहीं,
या दे दो उस ज्ञान के समुद्र को
जहाँ सूरज कभी ढलता ही नहीं,
बाप मरा भूखा ही
और हम मरे इस ढोंग में,
अवसर देख गिद्ध इधर,
टूट पड़े हैं भोग में।








