कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...
तुम जन चोटीयन की पैदाइश
हम जन एड़ीयन जाया रे?
कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...
हमरे पुश्त सात मरी गइले
बिन खाए आंत खल गइले
पुरखन खेतन में जल गइले
तुम जले हौ हमारी छाया रे।
कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...
हमरी गगरिया चुल्हवन तक धावै
बिनी चदरिया देह लगावै
फिर हमरे अछूत कइसे हो गइले
तोहरे जन देव की काया रे।
कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...
स्वर्ग में ठेले मरत समइया
खा गए धूरत गाढ़ी कमईया
द्रव्य से दानपत्री घर लइले
और कहे जग माया रे।
कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...
हमरे छाले छालन में फूटै
कारखानन में हड्डी तक टूटै
करि जाँगर कै नसबंदी
ऊ दान का बछिया पाया रे।
कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...
एगो पिंजरा सोने का मढी के
राम जाप कराया रे
कउवा बन आचार्य जगत में
तोते को शागिर्द बनाया रे।
कइसा धरम बनाया रे मानुष!
कइसा धरम बनाया रे...








