सुबह-सुबह उठ के

बा. सी. मर्ढेकरबा. सी. मर्ढेकर1 Dec 1909 – 20 Mar 1956

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सुबह-सुबह उठ के, पीना चाय औ’ काफ़ी;

और तुरंत पकड़ना विद्युत की ट्रेन।

दाँतों में तिनका धारे, कहना झुक कर ‘हूज़ूर’

फिर दुपहर का खाना, बस यही सार्थकता।

शाम होने पर, भले लगी हो ज़ोरों की भूख,

फिर भी बाल-बच्चों पर, होना नहीं नाराज़।

नींद की खोपड़ी में, चिंताओं के बिल,

सब मिट्टी हो गया, होना ही था।

किसी के पैरों का कुछ भी होवे प्रभाव,

अपने राम बैठे-बैठे, फूँकते हैं बीड़ी।

जहाँ धुआँ उठता है, वहाँ आग जलती है,

हम हैं जमदग्नि, प्रेत के रूप-सदृश्य।

बा. सी. मर्ढेकर
About the poet

बा. सी. मर्ढेकर

मराठी नवकाव्य के अग्रणी कवि और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बाळ सीताराम मर्ढेकर जन्म : 01/12/1909 | फैज़पुर, महाराष्ट्र निधन : 20/03/1956 | देहली, दिल्ली

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