सुबह-सुबह उठ के, पीना चाय औ’ काफ़ी;
और तुरंत पकड़ना विद्युत की ट्रेन।
दाँतों में तिनका धारे, कहना झुक कर ‘हूज़ूर’
फिर दुपहर का खाना, बस यही सार्थकता।
शाम होने पर, भले लगी हो ज़ोरों की भूख,
फिर भी बाल-बच्चों पर, होना नहीं नाराज़।
नींद की खोपड़ी में, चिंताओं के बिल,
सब मिट्टी हो गया, होना ही था।
किसी के पैरों का कुछ भी होवे प्रभाव,
अपने राम बैठे-बैठे, फूँकते हैं बीड़ी।
जहाँ धुआँ उठता है, वहाँ आग जलती है,
हम हैं जमदग्नि, प्रेत के रूप-सदृश्य।








