गीले पीपे में मरे हुए चूहे

बा. सी. मर्ढेकरबा. सी. मर्ढेकर1 Dec 1909 – 20 Mar 1956

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गीले पीपे में मरे हुए चूहे :

गरदनें पड़ी हुईं, बिना किसी मोड़ के

होठों से मिले हुए होठ

सिर डले हैं : आसक्ति के बिना।

ग़रीब बेचारे, बिलों में जिए

और मरे पीपे में, हिचकी लेकर

भूरी आँखों से देखा दिन,

गात्र लिंग धोकर, दिन बीते।

ज़िंदा रहने पर बंदिश है,

मरने पर भी बंदिश है,

उदासी को ज़हरी आँखें हैं

वे भी काँच की,

शहद का छत्ता

होठों पर जो जमा हुआ

वह भी 'बैक्लाइट' का, 'बैक्लाइट' का

होठों पर जुड़े हुए होठ

पीपे में चूहों ने स्नान किया

स्नान किया।

बा. सी. मर्ढेकर
About the poet

बा. सी. मर्ढेकर

मराठी नवकाव्य के अग्रणी कवि और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बाळ सीताराम मर्ढेकर जन्म : 01/12/1909 | फैज़पुर, महाराष्ट्र निधन : 20/03/1956 | देहली, दिल्ली

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