गो कि बत्तियों से पंक्चर हो गई है रात
फिर भी कोई अँधेरे में करता है पंप।
हँसने का पागलपन सवार है
फिर भी रह-रह के भौंकते हैं आँसू।
फट्ट से रबर-जैसी रात ये बैठ गई
और इस वक़्त,
दूसरा टायर भी नहीं है पास।
मन पर जमी हुई पपड़ियों की राशियों को
कुत्ते चाटते हैं।
जिससे बन पड़े, वह अपने-अपने
कंधों पर ढो ले रात,
पलकों को आँखों पर ओढ़े,
वह भी हँसते मुँह से
रबर की पंक्चर हुई रात में
भौंकते हैं रबर के ही श्वान।








