बत्तियों से पंक्चर हो गई है रात

बा. सी. मर्ढेकरबा. सी. मर्ढेकर1 Dec 1909 – 20 Mar 1956

1 min read · 12.4K reads

गो कि बत्तियों से पंक्चर हो गई है रात

फिर भी कोई अँधेरे में करता है पंप।

हँसने का पागलपन सवार है

फिर भी रह-रह के भौंकते हैं आँसू।

फट्ट से रबर-जैसी रात ये बैठ गई

और इस वक़्त,

दूसरा टायर भी नहीं है पास।

मन पर जमी हुई पपड़ियों की राशियों को

कुत्ते चाटते हैं।

जिससे बन पड़े, वह अपने-अपने

कंधों पर ढो ले रात,

पलकों को आँखों पर ओढ़े,

वह भी हँसते मुँह से

रबर की पंक्चर हुई रात में

भौंकते हैं रबर के ही श्वान।

बा. सी. मर्ढेकर
About the poet

बा. सी. मर्ढेकर

मराठी नवकाव्य के अग्रणी कवि और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बाळ सीताराम मर्ढेकर जन्म : 01/12/1909 | फैज़पुर, महाराष्ट्र निधन : 20/03/1956 | देहली, दिल्ली

View profile & all 6 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like