जो अज्ञान में जनमे

बा. सी. मर्ढेकरबा. सी. मर्ढेकर1 Dec 1909 – 20 Mar 1956

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जो अज्ञान में जनमे, और अज्ञान में ही मरे,

उनको हे भगवान्, क्या कलेजे से लगाया तूने?

क्यों हुए निष्ठुर इतने, कि उनको भी छोड़ दिया

जन्म और मृत्यु के बाद भी, विश्वगर्भ में डाला।

इस धरती पर जनमे और देह हुई सफल उनकी

आए और कर्म किए और फिर चले गए।

आँसुओं के बिना गलती है चरबी उसी में दिखती है अज्ञान की छवि,

तेरे खेत में खाद और बीज वे बन गए।

हम ज्ञानी थक गए, पश्चात्ताप से हुए नहीं दग्ध,

और कभी न पसीजे, देखकर दुख औरों का!

बीने ज्ञान के कण हमने, रेत के कणों की तरह,

और अब बने कोरे पत्थर, बुद्धि के रूप में।

हमारी संवेदना हो गई थोथी, रूखी देह के परे

ऊपर अहम् का पहाड़, शुरू हुआ।

तपती है यह धरती, मगर आँसू या पसीने का नाम नहीं

बाँझ उदर के लिए इनाम : रूखी काया।

बा. सी. मर्ढेकर
About the poet

बा. सी. मर्ढेकर

मराठी नवकाव्य के अग्रणी कवि और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बाळ सीताराम मर्ढेकर जन्म : 01/12/1909 | फैज़पुर, महाराष्ट्र निधन : 20/03/1956 | देहली, दिल्ली

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